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कार्तिक मास की कहानी लिखी हुई | कार्तिक मास की कथा | Kartik Maas Ki Katha (kahani) | सास और बहू की कहानी

एक समय की बात है। एक सास और बहू थी। सब गांव में कार्तिक नहाने गंगा जी जाने लगे, तब सास बोली मैं कार्तिक नहाने तीर्थ जा रही हूं। तब बहू बोली सासु जी मैं भी चलूंगी। सासु बोली अभी तुम्हारी उम्र नहीं हुई है। अभी मुझे नहाने दो, तुम आगे नहाना, तुम घर में रहो। और मैं ही नहा कर आऊंगी। जब 7:30 से चली गई तब बहू ने कुम्हार के यहां से 33 मिट्टी के कूड़े लाई। छत पर रखे, और रोज रात को एक कूड़ा भर कर रखती। और सुबह उठकर नहाती, तब कहती।

“सासु नहावे उन्ड़े बैठे, बहू नहावे कून्ड़े बैठे।
हर हर गंगा मन चंगा तो कठौती में गंगा।।”

गंगा जी की धारा बहू के कूड़े में ही आ जाती थी। बहू नहाकर पूरा को उल्टा करके रख देती।

एक दिन जब सासू गंगा जी में नहा रही थी। तब सांस की नाक की नथ गंगा जी में गिर गई। वही घर पर बहू नहा रही थी। और बोलने लगी कि हे गंगा मैया मैं आप अपनी धारा कूड़े में लाए। इसके बाद वह बोली।

“सासु नहावे उन्ड़े बैठे, बहू नहावे कून्ड़े बैठे।
हर हर गंगा मन चंगा तो कठौती में गंगा।।”

इतना बोलने के बाद गंगा जी की धारा कुडे में आ गई। उसमें उसकी सास की नथ भी आ गई थी। तब बहू ने नथ लेकर बोली। यह तो नथ मेरे सासूजी का है। वही कार्तिक माह पूरा हो गया। सास गंगा जी से वापस आ गई। बहू सासू जी का सामान लेने गई। जाते समय सासूजी की नथ को पहन कर गई।

जब सास की नजर बहू पर पड़ी। तू सास ने अपनी नथ को देख ली। और बोली यह तो मेरा नथ है। यह तुम्हारे पास कहां से आ गई? तब बहू बोली की “सासु जी आप तो नहाने उड़े बैठे, मैं नहाने कूड़े बैठे” और उसके बाद मैंने राधा दामोदर जी का नाम लिया था। जिससे रोज गंगा मैया की धारा कूड़े में आती थी। यह नथ भी उसी धारा में आ गई और कूड़े में मुझे मिली।

सासु बोली की बहू मुझे ब्राह्मणों को भोजन कराना है। तो उस समय बहू भी बोली की आप चार ब्राह्मणों को भोजन कर आएंगी। उसके साथ मेरे लिए भी दो ब्राह्मणों का भोजन करा देना। क्योंकि मैं भी कार्तिक नहा ली हूं। तब सास बोली की तू कहां से कार्तिक, नहाई गंगा जी कहां गई। तब बहू ने कहा कि चलो ऊपर मैं आपको बताती हूं।

जब सास छत पर गई तो वहां पर देखी की 33 कूड़े उल्टे पड़े हुए हैं। जो कि वह सोने के हो गए थे। वही बहू बोली कि मैं रोज एक कूड़ा भरकर रखती थी। और रोज तड़के उठकर नहाती और कूड़ा को उल्टा कर देती। इसको देखकर सास बोली कि तुम्हारा नसीब बहुत अच्छा है। इसलिए गंगा जी की धारा कुडे में आ गई, और कूड़ा भी सोने के हो गए।

मैं मन में अहंकार रखकर ऊपर के मन से ही तीर्थ नहाने गई, इसलिए मुझे कुछ नहीं मिला। लेकिन वही तुमने श्रद्धा मन से कार्तिक नहाई, जिससे माता कार्तिक राधा दामोदर भगवान की कृपा तुम्हारे ऊपर बनी है।

अब दोनों सास बहू मिलकर खूब ब्राह्मणों को भोजन कराया, और होम कराया, ब्राह्मणों को दक्षिणा दिया। ब्राह्मणों को साड़ी दिया और उन्हें खुश करके वापस भेजा।

हे गंगा मैया जिस तरह आपने बहू की के लिए धारा बनकर आई। वैसे ही मेरी लिए भी आना।

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