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माघ (मौनी) अमावस्या कब है 2024 - जाने क्या होता है?, और क्यों मनाया जाता है?, मौनी अमावस्या महत्व, पूजा विधि और कथा के बारे में

आज हम यहां पर माघ मौनी अमावस्या के बारे में विस्तार से जानेंगे। की मोनी अमावस्या कब है?, मौनी अमावस्या का क्या महत्व है?, मौनी अमावस्या क्यों मनाया जाता है?, मौनी अमावस्या की पूजा विधि क्या रहेगी? और मौनी अमावस्या का कथा क्या है? इसी के बारे में आज हम विस्तार से चर्चा करने वाले हैं।

जिससे आपको मौनी अमावस्या से संबंधित सभी बातों के बारे में जानकारी प्राप्त हो जाएगा। मौनी अमावस्या के बारे में आपको कहीं और जानकारी प्राप्त करने के लिए नहीं जाना पड़ेगा। इसलिए यहां पर मौनी अमावस्या के बारे में संपूर्ण जानकारी दिया गया है।

मौनी अमावस्या क्या होता है?

हिंदू धर्म में माघ माह के अमावस्या का बेहद महत्व है। क्योंकि हिंदू पंचांग के अनुसार माघ महीने के अमावस्या तिथि को मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। क्योंकि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करके व्यक्ति पूरे दिन मौन रहता है। अर्थात मौन व्रत का पालन करता है। इसलिए इसे मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है।

मौनी अमावस्या का अर्थ क्या है?

मान्यता यह है। कि मुनि शब्द से मौनी शब्द का उत्पत्ति हुआ है। मोनी अमावस्या बेहद खास है क्योंकि इस दिन पवित्र संगम में देवी देवताओं का वास होता है। इसलिए पवित्र नदियों में स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। और माघ मास को भी कार्तिक मास के समान ही पुण्य मास माना जाता है।

मौनी अमावस्या का महत्व क्या है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है। कि जो व्यक्ति मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान करता है। उसे पुण्य की प्राप्ति होता है। उसके सभी पाप मिट जाते हैं। और उसके सभी रोग और कष्ट भी मिट जाते हैं। उसको मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होता है।

मौनी अमावस्या कब मनाई जाती है?

मौनी अमावस्या माघ कृष्ण पक्ष के तीसवी तिथि अर्थात माघ मास के अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन स्नान और दान का विशेष महत्व है। इसलिए अमावस्या तिथि को व्रत रखने वालों के लिए स्नान और दान दोनों करना अनिवार्य है। इससे पुण्य की प्राप्ति होता है।

मौनी अमावस्या के दिन क्यों रहा जाता है मौन?

माना जाता है। कि मौनी अमावस्या के दिन मोहन रहने से मन को शांति पहुंचता है। जिससे व्यक्ति भगवान को सच्चे मन से याद कर पाता है। जिससे उस व्यक्ति के अंदर की सारी बुराइयां खत्म हो जाती हैं। और उस व्यक्ति का मन शांत हो जाता है। अगर मौनी अमावस्या के दिन कोई व्यक्ति मौन व्रत को धारण नहीं करता है। तो उसे मौनी अमावस्या के दिन किसी को भी कटु वचन नहीं बोलना चाहिए।

मौनी अमावस्या पर क्या करना चाहिए?

अब हम जानेंगे। कि मौनी अमावस्या के दिन हमें क्या-क्या करना चाहिए? जिससे हमें पुण्य की प्राप्ति हो और हमारे ऊपर प्रभु की कृपा बनी रहे।

• मौनी अमावस्या के दिन स्नान और दान का विशेष महत्व है। इसलिए स्नान करने के बाद आप कपड़े, आंवला, तिल के लड्डू, तिल का तेल, या तिल को दान कर सकते हैं।
• मौनी अमावस्या सर्दी के मौसम में आता है। इसलिए आप किसी को कंबल या ऊनी कपड़े दान कर सकते हैं। और जरूरतमंद लोगों को भोजन भी करा दें।
• मौनी अमावस्या के दिन गंगा नदी में स्नान करना पवित्र माना जाता है। इस दिन आप किसी भी पवित्र नदी में स्नान कर सकते हैं।

मौनी अमावस्या पर क्या नहीं करना चाहिए?

अब हम जानेंगे। कि मौनी अमावस्या के दिन हमें कौन-कौन से कार्य नहीं करनी चाहिए। जिससे हम दोष और पाप के भागीदारी बने।

• मौनी अमावस्या के दिन प्रातः काल उठकर बिना कुछ बोले मौन होकर स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद आप मौन व्रत को धारण कर सकते हैं। या उसे तोड़ सकते हैं।
• मौनी अमावस्या के दिन किसी भी व्यक्ति को कटु वचन न बोले।
• मौनी अमावस्या के दिन घर में कल ना होने दें।
• मौनी अमावस्या के दिन नहाने के बाद या नहाने से पहले कभी भी तेल नहीं लगाना चाहिए। अर्थात शरीर पर तेल का मालिश नहीं करना चाहिए।
• जो भी व्यक्ति मौनी अमावस्या का व्रत करता है। उसे व्रत के दिन सादा रूप ही रखना चाहिए। अर्थात उस व्यक्ति को श्रृंगार नहीं करना चाहिए।
• मौनी अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जाग जाना चाहिए। अर्थात देर तक नहीं सोना चाहिए।
• जो व्यक्ति शराब या मांस का सेवन करते हैं। उन्हें किसी भी पर्व पर शराब और मांस का सेवन नहीं करना चाहिए।

मौनी अमावस्या का व्रत और पूजा कैसे किया जाता है?

अब हम मौनी अमावस्या के दिन व्रत और पूजा कैसे किया जाता है? इसके बारे में जानेंगे। अर्थात व्रत और पूजा करने की विधि को जानेंगे।

• मौनी अमावस्या के दिन ब्रह्म मुहूर्त में जगने के बाद मौन रहना चाहिए।
• मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने का विशेष महत्व है। इसलिए प्रातः काल उठकर गंगा स्नान या कोई भी पवित्र नदी में जाकर स्नान करें। अगर आप नदी नहीं जा सकते हैं। तो आप घर में ही पानी में गंगाजल डालकर स्नान कर सकते हैं।
• स्नान करने के बाद विष्णु भगवान का ध्यान करना चाहिए। और व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए।
• विष्णु भगवान की पूजा करने के बाद तुलसी के 108 बार परिक्रमा करना चाहिए।
• पूजा समाप्त होने के बाद मौनी अमावस्या के दिन दान का भी विशेष महत्व है। इसलिए अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र आदि का दान कर सकते हैं।

मौनी अमावस्या व्रत कथा

एक प्रचलित कथा के अनुसार कांचीपुरी में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धनवती और सात पुत्रों-एक पुत्री के साथ रहता था। कन्या का नाम गुणवती था। ब्राह्मण अपने सभी पुत्रों के विवाह के बाद अपनी पुत्री के लिए वर खोजना चाहता था। ब्राह्मण ने पंडित को बेटी की कुंडली दिखाई। कुण्डली देखकर पंडित ने कहा कि कन्या के जीवन में बैधव्य दोष है। यानी वह विधवा हो जाएगी। पंडित ने इस दोष को दूर करने का उपाय बताया।

उन्होंने बताया कि यदि कन्या किसी अलग सोमा (धोने वाला) की पूजा करती है। तो यह दोष दूर हो जाएगा। गुणवती को अपनी सेवा से सोमा को प्रसन्न करना है। इस उपाय को जानकर ब्राह्मण ने अपने छोटे बेटे और बेटी को सोम को लेने के लिए भेजा। सोमा सागर के सिंहली द्वीप पर रहती थी। छोटा बेटा समुद्र पार करने की चिंता में एक पेड़ की छाया के नीचे बैठ गया। उस पेड़ पर गिद्ध का परिवार रहता था। शाम को जब गिद्ध के बच्चों की माँ अपने घोंसले में वापस आई, तो उसे पता चला कि उसके गिद्ध बच्चों ने नहीं खाया है।

गिद्ध के बच्चों ने अपनी मां को बताया कि दो जीव सुबह से भूखे-प्यासे पेड़ के नीचे बैठे हैं। जब तक वे कुछ नहीं खाएंगे, हम कुछ नहीं खाएंगे। यह सुनकर गिद्धों की माता उन दो प्राणियों के पास गई और बोली- मुझे तुम्हारी इच्छा का पता चला है। मैं तुम्हें सुबह समुद्र के पार ले जाऊंगी। लेकिन इससे पहले कुछ खा लो, मैं तुम्हारे लिए खाना लाती हूं।

अगली सुबह गिद्ध ने दोनों भाइयों और बहनों को समुद्र पार कराया। दोनों सोमा के घर पहुंचे और बिना कुछ बताए। उसकी सेवा करने लगे। वह घर को लिपने-पोतने लगे। सोमा ने एक दिन अपनी बहुओं से पूछा, कौन रोज सुबह हमारे घर की सफाई करता है? सभी ने कहा कि कोई नहीं बल्कि हम ही हैं। जो घर को लिपने-पोतने हैं। लेकिन सोमा को अपने परिवार वालों की बातों पर विश्वास नहीं हुआ।

एक रात इस रहस्य को जानने के लिए वह सुबह तक जागी रही। तो पता चला कि ये भाई-बहन उसके घर को लिपने-पोतने हैं। सोमा ने उन दोनों से बात की और दोनों ने सोमा को बहन की गलती और निवारण के बारे में बताया। सोम ने गुणवती को उस दोष से छुटकारा दिलाने का वादा किया, लेकिन गुणवती के भाई ने उसे घर आने का आग्रह किया। तो सोमा मान गयी, वह उन दोनों को लेकर ब्राह्मण के घर पहुंच गई।

सोमा ने अपनी बहुओं से कहा कि अगर उसकी अनुपस्थिति में कोई मर जाता है। तो उसके शरीर को नष्ट ना करे। मेरी प्रतीक्षा करे। इतना कहकर वह गुणवती को लेकर उसके घर चली गई। गुणवती के विवाह का कार्यक्रम तय हुआ। लेकिन सप्तपदी को प्राप्त होते ही उनके पति की मृत्यु हो गई। सोमा ने तुरंत गुणवती को अपने पुण्यों का फल दिया। उसका पति तुरंत जीवित हो गया। सोमा ने उन दोनों को आशीर्वाद देने के बाद चली गई। गुणवती को पुण्य देने के कारण सोमा के पुत्र, जमाता और पति की मृत्यु हो गई।

सोमा ने पुण्य फल को प्राप्त करने के लिए मार्ग में पीपल की छाया में विष्णुजी की पूजा की, 108 परिक्रमा की और व्रत रखा। परिक्रमा पूरी होते ही उनके परिवार के मृत सदस्य जीवित हो गए। निःस्वार्थ सेवा का फल मिला।

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